Kanya Bhrun Hatya Par Kavita | Hindi Poetry Kanya Bhrun Hatya

kanya bhrun hatya par kavita
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Kanya Bhrun Hatya Par Kavita | Hindi Poetry Kanya Bhrun Hatya

स्वागत है, Hindi Poetry के चाहने वालों का। आज की poetry series में हम “Kanya Bhrun Hatya Par Kavita, Hindi Poetry Kanya Bhrun Hatya” आपके लिए लेकर आये हैं। उम्मीद है ये कन्या भ्रूण हत्या पर कविता आपके हृदय तक जरूर दस्तक देगी। अगर आपको बेटी पर कविता पसन्द आये, तो इसे ज्यादा से ज्यादा share करें।

Kanya Bhrun Hatya Par Kavita

लिंगानुपात देखा तो होश ही उड़ गए,
बेटी बेटो से कम पाए,
बहुएं कहां से लाए,
अब तो समझ जाओ,
बेटी को बचाओ।
समझे,समझे,समझे बात,
बेटी बेटो से आज कम नहीं,
ऐरोप्लेन वो आज उड़ाए,
सीमा पर लडने वो जाए,
अब तो समझ जाओ,
बेटी को बचाओ।
समझे,समझे,समझे बात,
झांसी का समरांगण हो या
मेवाड़ का मान हो,
पुत्र की बली वो चढ़ाये,
वो लक्ष्मी,पन्ना कहां से लाए,
अब तो समझ जाओ,
बेटी को बचाओ।
समझे,समझे,समझे बात,
बिन बेटी माँ कहाँ से लाए,
राखी को कैसे मनाए,
दादी, नानी कौन कहलाए,
पापा तुम्हें कौन बुलाए,
अब तो समझ जाओ,
बेटी को बचाओ।

– मदन सिंह सिन्दल

पेट में बिलखती बेटी करो न बिदाई,
पेट से न मेरी मम्मी करो न बिदाई,
सृजन की मैं सहचरी जानत देव सदाई,
खुशी खुशी करो मेरा अभिनन्दन,
देदो मेरा भाग सुगठन,
शक्ति सरूपा मैं जग की करते सभी बड़ाई,
पेट से………..बिदाई।

kanya bhrun hatya par kavita
kanya bhrun hatya par kavita

मैं हूँ सृष्टि रचने वाली,
जग का करती पालन,
देख देख कर सारा जग,
करता है मेरा अभिवादन,
मुझे मेरा हक पा लेने दो सुन लो मेरी दुहाई,
पेट से………..बिदाई।

मै बनूँगी दीपक की लौ,
खुद के तले अंधेरा,
मैं सबके जीवन में ला दूंगी सुंदर सवेरा,
मैं हूँ अमृत निर्मल गंगा सबकी प्यास बुझाई,
पेट से………..बिदाई।

इतने पर मुझको मत मसलो,
हक दे दो मुझे निखरने का,
वादा करती मौका दो परखने का,
वंश बढ़ाने को दूंगी मैं वल्ल्भ कुल के वारिश को,
पोश पाल कर मेरी मम्मी कर देना मेरी बिदाई,
पेट से………..बिदाई।

– पूजा शेखर शुक्ला

Hindi Poetry Kanya Bhrun Hatya

सब मार रहे हैं मुझे गर्भ में,
पापा तुम भी मुझे मार देते,
लाकर इस दुनिया में मुझे क्यों,
पापा तुम इतना दुलार देते।

मैं नन्ही कली तुम्हारे आंगन की,
जब बनूंगी दुल्हन साजन की,
दो घरों को आपस में जोड़कर,
पापा लाज रखूंगी तुम्हारे दामन की।

सब जगह अनपढ़, लाचार सी हूँ मैं,
पापा तुम क्यों इतना संस्कार देते,
सब मार रहे हैं मुझे गर्भ में,
पापा तुम भी मुझे मार देते।

अब लाये हो मुझे दुनिया में,
तो पूरा करके अपना कर्म जाऊँगी,
बेटी, बहन कभी बहू तो माँ,
एक ही जन्म में सारे धर्म निभाऊँगी।

सृष्टि का नियम चक्र चलाने में,
पापा तुम संसार को उपहार देते,
सब मार रहे हैं मुझे गर्भ में,
पापा तुम भी मुझे मार देते।

पापा तुम क्यों इतने प्यारे हो,
मुझे गर्व है तुम बाप हमारे हो,
क्या करोगे इतनी लड़कियां पैदा करके,
पापा तुम सच में सबसे न्यारे हो।

भैया से भी ज्यादा क्यों मुझे,
पापा तुम इतना लाड़-प्यार देते,
सब मार रहे हैं मुझे गर्भ में,
पापा तुम भी मुझे मार देते।

हर काम में हाथ बटाऊँगी,
आस बनूंगी मैया की,
आएगा जब रक्षाबंधन,
तब राखी बनूंगी भैया की,
बाबुल के अंगना में नाचूं,
गाऊँ राधा-मीरा सी,
सुबह-शाम बनकर वंशी,
बाजूं कृष्ण कन्हैया की।

पालकर बेटियां अपने घर में पापा तुम,
अज्ञानी संसार को गीता जैसा सार देते,
सब मार रहे हैं मुझे गर्भ में ही,
काश पापा तुम भी मुझे मार देते।

– मिस्टर आकाश

Beti Par Kavita

मत छीनो जीने का अधिकार,
गर्भ जब ठहरा तो प्रसन्न हुए,
जाना बेटी है तो क्यों सन्न हुए,
उसको भी है रहने का अधिकार,
मत छीनो जीने का अधिकार।

दुनिया सिर्फ बेटे से नहीं चलती,
बेटी का होना उतना जरूरी है,
बेटी को दो सपने सीने का अधिकार,
मत छीनो जीने का अधिकार।

आँगन की तुलसी कौन बनेगी,
खुशियों की क्यारी सूनी रहेगी,
चाहे तुम खर्चा करो हजार,
मत छीनो जीने का अधिकार।

बिन बेटी ये दुनिया आधी है,
बेटी है तो यहां शहजादी है,
बदलो सोचने का आकार,
मत छीनो जीने का अधिकार।

– गंवार लेखक

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