Best Dahej Poem In Hindi | दहेज पर कविता | Dahej Pratha Kavita

Dahej Poem
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Best Dahej Poem In Hindi | दहेज पर कविता | Dahej Pratha Kavita

हमारे समाज में दहेज प्रथा आज भी ज़िंदा है, इसके हालात पर नज़र रखती आज Best Dahej Poem In Hindi लेकर प्रस्तुत हुए हैं। इन हिंदी कविता में बेटी के लिए भाव व्यक्त किये गए हैं और बेटी के ससुराल में क्या हालात होते हैं उन्हें भी बताया गया है। उम्मीद है आज की ये दहेज पर कविता आपको जरूर पसन्द आएगी। ये कविताएं हमारे प्लेटफॉर्म True Feel Hindi के कवियों ने बेटियों के और समाज के हित के लिए लिखा है। अगर ये कविताएं आपको अच्छी लगे, तो Awarness के लिए इस पोस्ट को Share ज़रूर करें। तो चलिए पढ़ते हैं आज की दहेज प्रथा पर कविताएं।

Dahej Poem – दुल्हन ही दहेज़ है

बेटी पैदा होते ही बाप कमाने में लग जाता है,
पाई पाई जोड़ कर बेटी का दहेज जुटाता है,
जानता है भूखे भेड़ियों के बड़े पेट को भरना है,
दहेज़ के लिए सालों तक कर्ज का सूद चुकाता है।

पेट काट दूल्हे का टीवी, सोफा, गाड़ी जुटाता है,
पैसे के बल पर बेटी का रिश्ता जोड़ा जाता है,
बेटी विदा कर बाप होने का फर्ज निभाता है,
फिर भी पैसे की ख़ातिर रिश्ता तोड़ा जाता है।

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बेटी के रिश्ते में मोल भाव सब चलता है,
देख लाचारी पापा की साथ में रब चलता है,
बेटी होने का मलाल दिल ही दिल में खलता है,
चाहती है ना करे विवाह जोर कहाँ अब चलता है।

कर विदा बेटी को बाप फ़र्ज़ से मुक्त हो जाता है,
घर का आँगन उजड़ी बगिया सा सूना हो जाता है,
चाहिए कुछ पैसे पापा जी पैगाम यही फिर आता है,
पैसे पा कर फिर मांगने का सिलसिला शुरू जो जाता है।

कर बहाना कोई बेटी को मायके पहुँचाया जाता है,
हो कर असमर्थ जब बाप पैसे पहुँचा नहीं पाता है,
सुन कर ताने ससुराल के बेटी सब दुःख़ सहती है,
बेटी को जलाकर मारने का पैगाम मायके में आता है।

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दहेज़ के लेन देन में समाज की मंजूरी होती है,
कब जाने दुनिया कहेगी हमें दहेज़ से परहेज है,
बेटी के बाप की इसे देने की मजबूरी होती है,
जाने कब समाज ये कहेगा दुल्हन ही दहेज़ है।

- राम सिंगार "देवदूत"

Dahej Poem In Hindi – बेटी जब से बड़ी हुई

बेटी जब से बड़ी हुई,
समझो समस्या खड़ी हुई,
ना जुटा पाए दहेज अगर,
घर में बेटी रहेगी पड़ी हुई।

शादी के बाद भी नहीं छोड़ा जाता,
दहेज के लिए रोज तोड़ा जाता,
सारी समस्या को सहजता से सहती,
नारी फिर भी मान मर्यादा बनाये रहती।

जन्म लिया जिस घर में देखो,
वो वहां की रानी और पापा की परी हुई,
जिस घर में कदम रखे स्वर्ग मानकर,
दहेज की प्रताड़ना से वही अधमरी हुई।

लोग बदले बदले हज़ारों साल,
हमारे समाज का नहीं बदला हाल,
आज भी दुल्हन घर लाने को,
बिछाया जाता दहेज का जाल,
लगता लोगों की आत्मा है मरी हुई,
कब से मान रहे ये कुप्रथा सड़ी हुई।

दहेज हमारे समाज पर अभिशाप बने,
मानव जीवन का सबसे बड़ा पाप बने,
इस कष्ट का करना हो कभी आभास,
उससे पूछो जो एक बेटी का बाप बने,
कितनो का नाम गिनाए बिलाल,

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दहेज पीड़ित से ये दुनिया भरी हुई,
बेटी जब से बड़ी हुई समझो समस्या खड़ी हुई।

- बिलाल राय "आसनसोल"

Dahej Par Kavita – दहेज की आड़ में

दहेज की इस आग में कितनी जलेगी और बेटियां,
दहेज की इस कुप्रथा से कितनो की उठेगी और खटिया।

बेटी की खुशी के लिए युगों से बोझ ढोता रहा बाप,
तरस आया न क्यों किसी को ज़माने में और होता रहा पाप।

कभी बिक गई थी खेती अब बिकने लगा है घर,
घर बेटी का बसाते बसाते कभी बाप ही रख देता है सर।

पूँजी गई जीवन की लोगों की ऊंची ऊंची बोली में,
फिर पगलाई हुई लालच में बैठ नहीं पाई बेटी डोली में।

- श्री वसावे एन. के.

बेटियां कठपुतली बन जाती है

दहेज के कारण विवश बेटियां कठपुतली बन जाती है,
मुखर जो थी कभी पीहर में अब मौन रह जाती है।

खामोश रहे पर तकलीफ़ उसकी व्यथा बताती है,
अब न चहचहाती है बुलबुल न वो गीत सुनाती है।

सुन्दर सपना संजोने वाली हर ख्वाब अब मिटाती है,
अश्क के भरे समंदर में हर ख्वाहिशें डुबाती है।

प्यार की प्यास है मगर निराश अब रह जाती है,
दहेज के कारण विवश बेटियां कठपुतली बन जाती है।

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कुरीति फैली है ऐसी कि बेवक्त घटा छा जाती है,
बरसती आग दहेज की यहां मानवता मिटाती है।

अपराधों का हो शिकार बेटियां बेमौत मारी जाती है,
दहेज के कारण विवश बेटियां कठपुतली बन जाती है।

- दिग्वजय सिंह त्यागी

Dahej Kavita – दहेज पर जलती बेटी

माँ की लाडली होती बेटी,
पिता का अभिमान है बेटी,
शादी हुई ससुराल गई,
मन में ले हजार सपने,
अब बहू कहलाने लगी बेटी,
नए परिवार में रमने लगी बेटी।

सबको अपना समझती,
जल्दी उठ सबका ध्यान रखती,
सबका मान सम्मान करती,
बचा भोजन अंत में खुद करती बेटी।

तनिक भी गलती होने पर,
सास ससुर ननंद पति से,
डांट खाती बेटी सब कुछ सहती,
कुछ ना कहती ऐसी होती बेटी।

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अपनी तकलीफ छिपाकर,
सबसे हँसकर बात करती,
ऐसी संस्कारित होती बेटी,
फिर भी कोख में मार दी जाती बेटी,
दहेज के नाम जलाई जाती बेटी।

ये कृत्य ना हुआ बंद,
तो हम किसे कहेंगे मां,
किससे सुनेंगे लोरी,
किसके हाथ की खाएंगे रोटी,
रह जाएगी कलाई सूनी,
यदि ना होगी हमारी बेटी।

बंद करें ऐसी बर्बरता सारी,
बेटी का करना होगा सम्मान,
भेद मिटा माने बेटा बेटी एक समान,
दहेज लोभियों को मिटा,
न लेंगे न देंगे का भाव जगाना होगा,
दहेज रूपी अभिशाप को,
समाज से दूर भगाना होगा।

Dahej Pratha Par Kavita – दहेज के लोभी

बहुत सहमी सहमी सी,
कुछ डरी डरी भी,
भीती भाव से,
खौफ के मारे,
साध्वस विचार से,
मन में अंदेशा लिए हुए,
आतंकित सोच कर,
विभीषिका के साथ,
मेरी बेटी मुझे देख,
भय से कांप रही है।

दुर मुझसे जा रही है,
जोर जोर से चिल्ला कह रही है,
चारों ओर त्रास ही त्रास है,
मैं यहां महफूज नहीं,
यहाँ बेटी के नाम पर,
जिन्हें दहेज,बैंक बेलेंस चाहिए,
और अंत में मुझे जलना ही है।

मैं तो मां की कोख में,
वापस जा रही हूं,
पर सोचती हूं ,
कि क्या मैं,
वहां भी सुरक्षित रह पाऊंगी,
तो फिर जाऊं तो जाऊं कहां।

- प्रमोद कुमार चौहान


Conclusion : तो हिंदी कविता के पाठकों आज हमने आपके लिए Best Dahej Poem In Hindi प्रस्तुत की। आज की कविताओं में हमारे कवियों द्वारा बेटी की दशा को व्यक्त किया गया। उम्मीद है आज की दहेज पर कविता आपको पसन्द आयी होगी। ये कविताएं पढ़कर आपको कैसा लगा ये हमें कमेन्ट में ज़रूर बताए। साथ ही बेटी और समाज के लिए जागरूकता बढ़ाने में हमारा सहयोग करने के लिए इन कविताओं से जुड़ी इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा Share करें। अगर आप और भी अन्य विषयों पर कविताएं पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी वेबसाइट पर रोज़ाना पब्लिश की जाती है।

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